शुक्रवार, 10 मई 2013

दुर्गा सप्तशती : ग्यारहवां अध्याय


ऋषिराज कहने लगे सुनो ऐ पृथ्वी नरेश
महाअसुर संहार से मिट गए सभी कलेश॥

इन्द्र आदि सभी देवता टली मुसीबत जान
हाथ जोड़कर अम्बे का करने लगे गुणगान॥

तू रखवाली मां शरणागत की करे
तू भक्तों के संकट भवानी हरे॥

तू विशवेश्वरी बन के है पालती
शिवा बन के दुःख सिर से है टालती॥

तू काली बचाए महाकाल से
तू चंडी करे रक्षा जंजाल से॥

तू ब्रह्माणी बन रोग देवे मिटा
तू तेजोमयी तेज देती बढ़ा॥

तू मां बनके करती हमें प्यार है
तू जगदम्बे बन भरती भंडार है॥

कृपा से तेरी मिलते आराम हैं
हे माता तुम्हें लाखों प्रणाम हैं॥

तू त्रयनेत्र वाली तू नारायणी
तू अम्बे महाकाली जगतारिणी॥

गुने से है पूर्ण मिटाती है दुःख
तू दासों को अपने पहुंचाती है सुख॥

चढ़ी हंस वीणा बजाती है तू
तभी तो ब्रह्माणी कहलाती है तू॥

वाराही का रूप तुमने बनाया
बनी वैष्णवी और सुदर्शन चलाया॥

तू नरसिंह बन दैत्य संहारती
तू ही वेदवाणी तू ही स्मृति॥

कई रूप तेरे कई नाम हैं
हे माता तुम्हें लाखों प्रणाम हैं

तू ही लक्ष्मी श्रद्धा लज्जा कहावे
तू काली बनी रूप चंडी बनावे॥

तू मेघा सरस्वती तू शक्ति निद्रा
तू सर्वेश्वरी दुर्गा तू मात इन्द्रा॥

तू ही नैना देवी तू ही मात ज्वाला
तू ही चिंतपूर्णी तू ही देवी बाला॥

चमक दामिनी में है शक्ति तुम्हारी
तू ही पर्वतों वाली माता महतारी॥

तू ही अष्टभुजी माता दुर्गा भवानी
तेरी माया मैया किसी ने ना जानी॥

तेरे नाम नव दुर्गा सुखधाम हैं
हे माता तुम्हें लाखों प्रणाम हैं॥

तुम्हारा ही यश वेदों ने गाया है
तुझे भक्तों ने भक्ति से पाया है॥

तेरा नाम लेने से टलती बलाएं
तेरे नाम दासों के संकट मिटायें॥

तू महामाया है पापों को हरने वाली
तू उद्धार पतितों का है करने वाली॥

दोहा :-
स्तुति देवों की सुनी माता हुई कृपाल
हो प्रसन्न कहने लगी दाती दीन दयाल॥

सदा दासों का करती कल्याण हूं
मैं खुश हो के देती यह वरदान हूं॥

जभी पैदा होंगे असुर पृथ्वी पर
तभी उनको मारूंगी मैं आन कर॥

मैं दुष्टों के लहू का लगाऊंगी भोग
तभी रक्तदन्तिका कहेंगे यह लोग॥

बिना गर्भ अवतार धारुंगी मैं
तो शताक्षी बन निहारूंगी मैं॥

बिना वर्षा के अन्न उपजाउंगी
अपार अपनी शक्ति मैं दिखलाऊंगी॥

हिमालय गुफा में मेरा वास होगा
यह संसार सारा मेरा दास होगा॥

मैं कलयुग में लाखों फिरूं रूप धारी
मेरी योगिनियां बनेंगी बीमारी॥

जो दुष्टों के रक्त को पिया करेंगी
यह कर्मों का भुगतान किया करेंगी॥

दोहा :-
'भक्त' जो सच्चे प्रेम से शरण हमारी आये
उसके सारे कष्ट मैं दूंगी आप मिटाए॥

प्रेम से दुर्गा पाठ को करेगा जो प्राणी
उसकी रक्षा सदा ही करेगी महारानी॥

बढ़ेगा चौदह भवन में उस प्राणी का मान
'भक्त' जो दुर्गा पाठ की शक्ति जाये जान॥

एकादश अध्याय में स्तुति देवं कीन
अष्टभुजी माँ दुर्गा ने सब विपदा हर लीन॥

भाव सहित इसको पढ़ो जो चाहे कल्याण
मुह मांगा देती है दाती वरदान॥

॥बोलिए जय माता दी जी॥

दुर्गा सप्तशती : दसवां अध्याय


ऋषिराज कहने लगे मारा गया निशुम्भ
क्रोध भरा अभिमान से बोला भाई शुम्भ॥

अरी चतुर दुर्गा! तुझे लाज जरा ना आये
करती है अभिमान तू बल औरों का पाए॥

जगदाती बोली तभी दुष्ट तेरा अभिमान
मेरी शक्ति को भला सके कहां पहचान॥

मेरा ही त्रिलोक में है सारा विस्तार
मैंने ही उपजाया है यह सारा संसार॥

चंडी काली, ऐन्द्री, सब हैं मेरे रूप
एक हूं मैं अम्बिका मेरे सभी स्वरूप॥

मैं ही अपने रूपों में एक जान हूं
अकेली महा शक्ति बलवान हूं॥

चढ़ी सिंह पर दाती ललकारती
भयानक अति रूप थी धारती॥

बढ़ा शुम्भ आगे गरजता हुआ
गदा को घुमाता तरजता हुआ॥

तमाशा लगे देखने देवता
अकेला असुर राज था लड़ रहा॥

अकेली थी दुर्गा इधर लड़ रही
वह हर वर पर आगे थी बढ़ रही॥

असुर ने चलाये हजारों ही तीर
जरा भी हुई ना वह मैया अधीर॥

तभी शुम्भ ने हाथ मुगदर उठाया
असुर माया कर दुर्गा पर वह चलाया॥

तो चक्र से काटा भवानी ने वो
गिरा धरती पे हो के वह टुकड़े दो॥

उड़ा शुम्भ आकाश में आ गया
वह उपर से प्रहार करने लगा॥

तभी की भवानी ने उपर निगाह
तो मस्तक का नेत्र वही खुल गया॥

हुई ज्वाला उत्पन्न बनी चंडी वो
उड़ी वायु में देख पाखंडी को॥

फिर आकाश में युद्ध भयंकर हुआ
वहा चंडी से शुम्भ लड़ता रहा॥

दोहा :-
मारा रणचंडी ने तब थप्पड़ एक महान
हुआ मूर्छित धरती पे गिरा शुम्भ बलवान॥

जल्दी उठकर हो खड़ा किया घोर संग्राम
दैत्य के उस पराक्रम से कांपे देव तमाम॥

बढ़ा क्रोध में अपना मुहं खोल कर
गरज कर भयानक शब्द बोल कर॥

लगा कहने कच्चा चबा जाऊंगा
निशां आज तेरा मिटा जाऊंगा॥

क्या सन्मुख मेरे तेरी औकात है
तरस करता हूं नारी की जात है॥

मगर तूने सेना मिटाई मेरी
अग्न क्रोध तूने बढ़ाई मेरी॥

मेरे हाथों से बचने न पाओगी
मेरे पावों के नीचे पिस जाओगी॥

यह कहता हुआ दैत्य आगे बढ़ा
भवानी को यह देख गुस्सा चढ़ा॥

चलाया वो त्रिशूल ललकार कर
गिरा काट के सिर दिया का धरती पर॥

किया दुष्ट असुरों का मां ने संहार
सभी देवताओं ने किया जय-जयकार॥

ख़ुशी से वे गंधर्व गाने लगे
नृत्य करके मां को रिझाने लगे॥

'भक्त' चरणों में सिर झुकाते रहे
वे वरदान मैया से पाते रहे॥

यही पाठ है दसवें अध्याय का
जो प्रीति से पढ़ श्रद्धा से गाएगा॥

वह जगदम्बे की भक्ति पा जायेगा
शरण में जो मैया की आ जायेगा॥

दोहा:-
आध भवानी की कृपा, मनो कामना पाए
'भक्त' जो दुर्गा पाठ को पढ़े सुने और गाए॥

कालिकाल विकराल में जो चाहो कल्याण
श्री दुर्गा स्तुति का करो पाठ 'भक्त' दिन रैन
कृपा से आद भवानी की मिलेगा सच्चा चैन॥

॥बोलिए जय माता दी॥

दुर्गा सप्तशती : नौवां अध्याय


राजा बोला ऐ ऋषि महिमा सुनी अपार
रक्तबीज को युद्ध में चंडी दिया संहार॥

कहो ऋषिवर अब मुझे शुम्भ निशुम्भ का हाल
जगदम्बे के हाथों से आया कैसे काल॥

ऋषिराज कहने लगे राजन सुन मन लाये
दुर्गा पाठ का कहता हूं अब मैं नवम अध्याय॥

रक्तबीज को जब शक्ति ने रण में मारा
चला युद्ध करने निशुम्भ ले कटक अपारा॥

तभी चढ़ा महाकाली को भी क्रोध घनेरा॥

महा पराक्रमी शुम्भ लिए सेना को आया
गदा उठा कर महा चंडी को मारण धाया॥

देवी और दैत्यों के तीर लगे फिर चलने
बड़े-बड़े बलवान लगे मिट्टी में मिलने॥

रण में लगी चमकाने वो तीखी तलवारें
चारों तरफ लगी होने भयंकर ललकारें॥

दैत्य लगा रण भूमि में माया दिखलाने
क्षण भर में वह योद्धा सारे मार गिराए॥

शुम्भ ने अपनी गदा घुमा देवी पर डाली
काली ने तीखी त्रिशूल से काट वह डाली॥

सिंह चढ़ी अम्बा ने कर प्रलय दिखलाई
चंडी के खड्ग ने हा हा कार मचाई॥

भर भर खप्पर दैत्यों का लहू पी गई काली
पृथ्वी और आकाश में छाई खून की लाली॥

अष्टभुजी ने शुम्भ के सीने मारा भाला
दैत्य को मूर्छित करके उसे पृथ्वी पर डाला॥

शुम्भ गिरा तो चला निशुम्भ भरा मन क्रोधा
अट्टाहास कर गरजा वह बलशाली योद्धा॥

अष्टभुजी ने दैत्य की मारा छाती तीर
हुआ प्रगट फिर दूसरा छाती से बलबीर॥

दोहा:-
बढ़ा वह दुर्गा की तरफ हाथ लिए हथियार
खड्ग लिए चंडी बढ़ी किये दैत्य संहार॥

शिवदूती ने खा लिए सेना के सब वीर
कौमारी छोड़े तभी धनुष से लाखों तीर॥

ब्रह्माणी ने मन्त्र पढ़ फेंका उन पर नीर
भस्म हुई सैना सभी देवं बांधा धीर॥

सैना सहित निशुम्भ का हुआ रण मे संहार
त्रिलोकी में मच गया माँ का जय जय कार॥

'भक्त' नवम अध्याय की कथा कही सुखसार
पाठ मात्र से मिटे विषम कष्ट अपार॥

॥जय माता दी॥
॥जय माता दी॥

दुर्गा सप्तशती : आठवां अध्याय


काली ने जब कर दिया चंड मुंड का नाश
सुनकर सेना का मरण हुआ निशुम्भ उदास॥

तभी क्रोध करके बढ़ा आप आगे
इकट्ठे किये दैत्य जो रण से भागे॥
  
कुलों के कुल असुरों के लिए बुलाई
दिया हुकम अपना उन्हें तब सुनाई॥

चलो युद्ध भूमि में सेना सजा के
फिरो देवियों का निशां तुम मिटा के॥

अधायुध और शुम्भ थे दैत्य योद्धा
भरा उनके दिल में भयंकर क्रोध॥

असुर रक्तबीज को ले साथ धाये
चले काल के मुहं में सेना सजाये॥

मुनि बोले राजा वह शुम्भ अभिमानी
चला आप भी हाथ में धनुष तानी॥

जो देवी ने देखी सेना आई
धनुष की तभी डोरी माँ ने चढाई॥

वह टंकार सुन गूंजा आकाश सारा
महाकाली ने साथ किलकार मारा॥

किया सिंह ने भी शब्द फिर भयंकर
आये देवता ब्रह्मा विष्णु व शंकर॥

हर एक अंश से रूप देवी ने धारा
वह निज नाम से नाम उनका पुकारा॥

बनी ब्रह्मा के अंश देवी ब्रह्माणी
चढ़ी हंस माला कमंडल निशानी॥

चढ़ी बैल त्रिशूल हाथो में लाई
शिवा शक्ति शंकर की जग में कहलाई॥

वह अम्बा बनी स्वामी कार्तिक की अंशी
चढ़ी गरुड़ आई जो थी विष्णु वंशी॥

वराह अंश से रूप वाराही आई
वह नरसिंह से नर्सिंघी कहलाई॥

ऐरावत चढ़ी इन्द्र की शक्ति आई
महादेव जी तब यह आज्ञा सुनाई॥

सभी मिल के दैत्यों का संहार कर दो
सभी अपने अंशो का विस्तार कर दो॥

दोहा :
इतना कहते ही हुआ भारी शब्द अपार
प्रगटी देवी चंडिका रूप भयानक धार॥

घोर शब्द से गरज कर कहा शंकर से जाओ
बनो दूत, सन्देश यह दैत्यों को पहुंचाओ॥

जीवत रहना चाहते हो तो जा बसे पाताल
इन्द्र को त्रिलोक का दें वह राज्य सम्भाल॥

नहीं तो आयें युद्ध में तज जीवन की आस
इनके रक्त से बुझेगी मह्काली की प्यास॥

शिव को दूत बनाने से शिवदूती हुआ नाम
इसी चंडी महामाया ने किया घोर संग्राम॥

दैत्यों ने शिव शम्भू की मानी एक ना बात
चले युद्ध करने सभी लेकर सेना साथ॥

आसुरी सेना ने तभी ली सब शक्तियां घेर
चले तीर तलवार तब हुई युद्ध की छेड़॥

दैत्यों पर सब देवियां करने लगी प्रहार
क्षण भर में होने लगा असुर सेना संहार॥

दसों दिशओं में मचा भयानक हाहाकार
नव दुर्गा का छा रहा था वह तेज अपार॥

सुन काली की गर्जना हए व्याकुल वीर
चंडी ने त्रिशूल से दिए कलेजे चीर॥

शिवदूती ने कर लिए भक्षण कई शरीर
अम्बा की तलवार ने कीने दैत्य अधीर॥

यह संग्राम देख गया दैत्य खीज
तभी युद्ध करने बढ़ा रक्तबीज॥

गदा जाते ही मारी बलशाली ने
चलाये कई बाण तब काली ने॥

लगे तीर सीने से वापस फिरे
रक्तबीज के रक्त कतरे गिरे॥

रुधिर दैत्य का जब जमीं पर बहा
हुए प्रगट फिर दैत्य भी लाखहा॥

फिर उनके रक्त कतरे जितने गिरे
उन्हीं से कई दैत्य पैदा हुए॥

यह बढ़ती हुई सेना देखी जभी
तो घबरा गए देवता भी सभी॥

विकल हो गई जब सभी शक्तियां
तो चंडी ने महा कालिका से कहा॥

करो अपनी जीभा का विस्तार तुम
फैलाओ यह मुहं अपना एक बार तुम॥

मेरे शस्त्रों से लहू जो गिरे
वह धरती के बदले जुबां पर पड़े॥

लहू दैत्यों का सब पिए जाओ तुम
ये लाशें भी भक्षण किये जाओ तुम॥

न इसका जो गिरने लहू पायेगा
तो मारा असुर निश्चय ही जायेगा॥

दोहा :
इतना सुन महाकाली ने किया भयानक वेश
गर्ज से घबराकर हुआ व्याकुल दैत्य नरेश॥

रक्तबीज ने तब किया चंडी पर प्रहार
रोक लिया त्रिशूल से जगदम्बे ने वार॥

तभी क्रोध से चंडिका आगे बढ़ कर आई
अपने खड्ग से दैत्य की गर्दन काट गिराई॥

शीश कटा तो लहू गिरा चामुंडा गई पी
रक्तबीज के रक्त से सके न निश्चर जी॥

महाकाली मुहं खोल के धाई
दैत्य के रुधिर से प्यास बुझाई॥

धरती पे लहू गिरने ना पाया
खप्पर भर पी गई महामाया॥

भयो नाश तब रक्तबीज का
नाची तब प्रसन्न हो कालिका॥

असुर सेना सब दी संघारी
युद्ध में भयो कुलाहल भारी॥

देवता गण तब अति हर्षाये
धरयो शीश शक्ति पद आये॥

कर जोड़े सब विनय सुनाये
महामाया की स्तुति गाये॥

चंडिका तब दीनो वारदान
सब देवन का कियो कल्याण॥

ख़ुशी से नृत्य किया शक्ति ने
वर यह दिया शक्ति ने॥

जो यह पाठ पढ़े या सुनाये
मनवांछित फल मुझ से पाए॥

उसके शत्रु नाश करूंगी
पूरी उसकी आस करुँगी॥

माँ सम पुत्र को मैं पालूंगी
सभी भंडारे भर डालूंगी॥

दोहा :
तीन काल है सत्य यह शक्ति का वरदान
नव दुर्गा के पाठ से है सब का कल्याण॥

भक्ति शक्ति मुक्ति का है यही भंडार
इसी के आसरे हो भवसागर पार॥

नवरात्रों मै जो पढ़े देवी के मंदिर जाए
कहे मारकंडे ऋषि मनवांछित फल पाए॥

वरदाती वरदायनी सब की आस पूजाए
प्रेम सहित महामाया की जो भी स्तुति गाए॥

सिंह सवारी मईया जी मन मंदिर जब आये
किसी भी संकट मे पड़ा भक्त नहीं घबराए॥

किसी जगह भी शुद्ध हो पढ़े या पाठ सुनाये
भवानी की कृपा उस पर ही हो जाये॥

नव दुर्गा के पाठ का आठवां यह अध्याय
निशदिन पढ़े जो प्रेम से शत्रु नाश हो जाये॥
  
॥बोलिए जय माता दी॥
॥जय माँ मेरी राज रानी की॥