कथा-कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कथा-कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 28 अप्रैल 2013

मेहनत का फल


        राजकुमारी रोजी की खूबसूरती की हर जगह चर्चा थी  सुनहरी आंखें, तीखे नयन-नक्श, दूध-सी गोरी काया, कमर तक लहराते बाल सभी सुंदरता में चार चांद लगाते थे एक बार की बात है  राजकुमारी रोजी को अचानक खड़े-खड़े चक्कर आ गया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी

        राज वैद्य ने हर प्रकार से रोजी का इलाज किया, पर राजकुमारी रोजी को होश नहीं आ रहा था
 राजा अपनी इकलौती बेटी को बहुत चाहते थे

        उस देश के रजउ नामक ग्राम में विलियम और जॉन नाम के दो भाई रहा करते थे
विलियम बहुत मेहनती और चुस्त था और जॉन अव्वल दर्जे का आलसी था सारा दिन खाली पड़ा बांसुरी बजाया करता था  विलियम पिता के साथ सुबह खेत पर जाता, हल जोतता व अन्य कामों में हाथ बंटाता

        एक दिन विलियम ने जंगल में तोतों को आदमी की भाषा में बात करते सुना
एक तोता बोला - "यहां के राजा की बेटी अपना होश खो बैठी है, क्या कोई इलाज है?" "क्यों नहीं, वह जो उत्तर दिशा में पहाड़ी पर सुनहरे फलों वाला पेड़ है वहां से यदि कोई फल तोड़कर उसका रस राजकुमारी को पिलाए तो राजकुमारी ठीक हो सकती है", दूसरे तोते ने कहा “पर ढालू पहाड़ी से ऊपर जाना तो बहुत कठिन काम है, उससे फिसलकर तो कोई बच नहीं सकता", पहले तोते ने कहा

        विलियम ने घर आकर सारी बात बताई तो जॉन जिद करने लगा कि वह फल मैं लाऊंगा और राजा से हीरे-जवाहरात लेकर आराम की बंसी बजाऊंगा
 फिर जॉन अपने घर से चल दिया  मां ने रास्ते के लिए जॉन को खाना व पानी दे दिया

        जॉन अपनी बांसुरी बजाता पहाड़ी की ओर चल दिया
 पहाड़ी की तलहटी में उसे एक बुढ़िया मिली, वह बोली - "मैं बहुत बुखी हूं  कुछ खाने को दे दो
जॉन बोला - "हट बुढ़िया, मैं जरूरी काम से जा रहा हूं
 खाना तुझे दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा?" और जॉन आगे चल दिया पर पहाड़ी के ढलान पर पहुंचते ही जॉन का पांव फिसल गया और वह गिरकर मर गया

        कई दिन इंतजार करने के पश्चात् विलियम घर से चला
 उसके लिए भी मां ने खाना व पानी दिया  उसे भी वही बुढ़िया मिली  बुढ़िया के भोजन मांगने पर विलियम ने आधा खाना बुढ़िया को दे दिया और स्वयं आगे बढ़ गया विलियम जब ढलान पर पहुंचा तो उसका पांव भी थोड़ा-थोड़ा फिसल रहा था, वह घास पकड़-पकड़ कर चढ़ रहा था  तभी उसे वहां दो तोते दिखाई दिए और उनमें एक-एक तड़पकर उसके आगे गिर गया विलियम को चढ़ते-चढ़ते प्यास भी लग रही थी और उसके पास थोड़ा ही पानी बचा था, फिर भी उसने तोते की चोंच में पानी डाल दिया चोंच पर पानी पड़ते ही तोता उड़ गया और न जाने तभी विलियम का पैर फिसलना रुक गया  विलियम तेजी से ऊपर चढ़ा और सुनहरे पेड़ तक पहुंच गया

        उसने पेड़ से एक फल तोड़ लिया
 फल को तोड़ते ही उसमें जादुई शक्ति आ गई  उसने आंखें मूंद लीं और जब आंखें खोली तो स्वयं को पहाड़ी से नीचे पाया और उसके सामने वही बुढ़िया खड़ी मुस्करा रही थी

        वह फल लेकर राजा के महल में पहुंचा और राजा की आज्ञा लेकर उसने फल का रस निकाल कर राजकुमारी के मुंह में डाल दिया
रस मुंह में पड़ते ही राजकुमारी ने आंखें खोल दीं  राजकुमारी बोली - "हे राजकुमार, तुम कौन हो?"
विलियम बोला - "मैं कोई राजकुमार नहीं, एक गरीब किसान हूं
"
इतने में राजा व उसके सिपाही आ गए  
राजा बोले - "आज से तुम राजकुमार ही हो नवयुवक  तुमने रोजी को नई जिन्दगी दी है  बताओ, तुम्हें क्या इनाम दिया जाए?"
विलियम बोला - "मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, मेरे पास बहुत थोड़ी जमीन है
 यदि आप मुझे पांच एकड़ जमीन दिलवा दें तो मैं ज्यादा खेती करके आराम से रह सकूंगा "

       राजा बोला - "सचमुच तुम मेहनती और ईमानदार हो
 तभी तुमने इतना छोटा इनाम मांगा है हम तुम्हारा विवाह अपनी बेटी रोजी से करके तुम्हारा राजतिलक करना चाहते हैं "

       विलियम बोला - "पहले मैं अपने माता-पिता की आज्ञा लेना अपना फर्ज समझता हूं
"
राजा विलियम की मातृ-पितृ भक्ति देखकर गद्गद हो उठा और बोला - "उनसे हम स्वयं ही विवाह की आज्ञा प्राप्त करेंगे
 सचमुच तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं जो उन्होंने तुम जैसा मेहनती व होनहार पुत्र पाया है "

        फिर राजा ने विलियम के पिता की आज्ञा से विलियम व रोजी का विवाह कर दिया और उसके पिता को रहने के लिए बड़ा मकान, खेती के लिए जमीन व काफी धन दिया

विलियम राजकुमारी के साथ महल में तथा उसके माता-पिता अपने बड़े वैभवशाली मकान में सुखपूर्वक रहने लगे

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

ईश्वर सब की सुनता है

                 जाड़े का दिन था और शाम होने आयी। आसमान में बादल छाये थे। एक नीम के पेड़ पर बहुत से कौए बैठे थे। वे सब बार बार काँव-काँव कर रहे थे और एक दूसरे से झगड़ भी रहे थे। इसी समय एक मैना आयी और उसी पेड़ की एक डाल पर बैठ गई। मैना को देखते ही कई कौए उस पर टूट पड़े । बेचारी मैना ने कहा “बादल बहुत हैं इसलिए आज अंधेरा हो गया है। मैं अपना घोंसला भूल गयी हूं, इसलिए आज रात मुझे यहाँ बैठने दो।“
कौओं ने कहा “नहीं यह पेड़ हमारा है तू यहाँ से भाग जा।“
मैना बोली “पेड़ तो सब ईश्वर के बनाये हुए है। मैं बहुत छोटी हूं तुम्हारी बहन हूं, तुम लोग मुझ पर दया करो और मुझे भी यहाँ बैठने दो।“
कौओं ने कहा – “हमें तेरी जैसी बहन नहीं चाहिये। तू बहुत ईश्वर का नाम लेती है तो ईश्वर के भरोसे यहां से चली क्यों नहीं जाती । तू नहीं जायेगी तो हम सब तुझे मारेंगे।“

         कौए तो झगड़ालू होते ही हैं, वे शाम को जब पेड़ पर बैठने लगते है तो उनसे आपस में झगड़ा किये बिना नहीं रहा जाता वे एक-दूसरे को मारते है और काँव काँव करके झगड़ते रहते है। कौन कौआ किस टहनी पर रात को बैठेगा। यह कोई झटपट तय नहीं हो जाता। उनमें बार-बार लड़ाई होती है, फिर किसी दूसरी चिड़या को वह पेड़ पर कैसे बैठने दे सकते हैं। आपसी लड़ाई छोड़ कर वे मैना को मारने दौड़े।

        कौओं को काँव काँव करके अपनी ओर झपटते देखकर बेचारी मैना वहां से उड़ गयी और थोड़ी दूर जाकर एक आम के पेड़ पर बैठ गयी।

        रात को आंधी आयी, बादल गरजे और बड़े बड़े ओले बरसने लगे। बड़े आलू जैसे ओले तड़-भड़ बंदूक की गोली जैसे गिर रहे थे। कौए काँव-काँव करके चिल्लाये। इधर से उधर थोड़ा बहुत उड़े परन्तु ओलों की मार से सब के सब घायल होकर जमीन पर गिर पड़े। बहुत से कौए मर गये।

        मैना जिस आम पर बैठी थी उसकी एक डाली टूट कर गिर गयी। डाल भीतर से सड़ गई थी और खोखली हो गई थी। डाल टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़ में एक खोंडर हो गया । छोटी मैना उसमें घुस गयी और उसे एक भी ओला नहीं लगा।

        सवेरा हुआ और दो घड़ी चढने पर चमकीली धूप निकली । मैंना खोंडर में से निकली पंख फैला कर चहक कर उसने भगवान को प्रणाम किया और उड़ी। पृथ्वी पर ओले से घायल पड़े हुए कौए ने मैना को उड़ते देख कर बड़े कष्ट से पूछा “मैना बहन तुम कहां रही, तुमको ओलों की मार से किसने बचाया?”
मैना बोली – “मैं आम के पेड़ पर अकेली बैठी थी और भगवान की प्रार्थना कर रही थी। दुःख में पड़े असहाय जीव को ईश्वर के सिवा कौन बचा सकता है। लेकिन ईश्वर केवल ओले से ही नहीं बचाते और केवल मैना को ही नहीं बचाते। जो भी ईश्वर पर विश्वास करता है और ईश्वर को याद करता है, उसे ईश्वर सभी आपत्ति-विपत्ति में सहायता करते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।“

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

सत्कार और तिरस्कार

         एक थका माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया। अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा, "उफ मुझे मत मारो।"
दूसरी बार वह रोने लगा, "मत मारो मुझे, मत मारो... मत मारो।"


       शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया, अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसमे से एक एक देवी की मूर्ति उभर आई। मूर्ति वहीं पेड़ के नीचे रख वह अपनी राह पकड़ आगे चला गया।

       कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार को फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ा, जहाँ पिछली बार विश्राम किया था। उस स्थान पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ उस मूर्ति की पूजा अर्चना हो रही है, जो उसने बनाई थी। भीड़ है, भजन आरती हो रही है, भक्तों की पंक्तियाँ लगीं हैं, जब उसके दर्शन का समय आया, तो पास आकर देखा कि उसकी बनाई मूर्ति का कितना सत्कार हो रहा है! जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने, उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक ओर में पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़ फोड़ कर मूर्ती पर चढ़ा रहे हैं।


       शिल्पकार ने मन ही मन सोचा कि जीवन में कुछ बन पाने के लिए शुरू में अपने शिल्पकार को पहचानकर, उनका सत्कारकर कुछ कष्ट झेल लेने से जीवन बन जाता हैं। बाद में सारा विश्व उनका सत्कार करता है। जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं, उनका सत्कार कोई नहीं करता।

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

किस्मत का सितारा

         किसी नगर में एक आदमी रहता था। नाम था सितारा। पर उसकी किस्मत का सितारा सोया हुआ था। वह मेहनत करता था। पर अच्छा फल न मिलने पर जल्दी ही हार कर बैठ जाता। निराश होकर सोचा करता। दिनों और महीनों ऐसे ही सोचता रहता। फिर बुझे मन से किसी काम में हाथ डालता था, तो फिर वैसा ही हो जाता। काम असफल हो जाता और वह निराश होकर फिर वैसे ही सोचने लगता।


             एक दिन सोते-सोते उसने एक सपना देखा। सपने में उसने देखा, उसकी किस्मत का सितारा एक पेड़ की टहनी पर चमक रहा है। उसने, लपक कर उसे पकड़ना चाहा, पर पकड़ न सका। जैसे-जैसे वह उसके पीछे भागता, वैसे-वैसे वह और दूर खिसकता मालूम होता। फिर एक जगह जाकर वह रुक गया। आगे समुद्र पड़ता था और सितारे वाला पेड़ दूर कहीं उसके पार दिखाई दे रहा था। वह बुरी तरह थक कर झुंझला उठा- अब क्या हो सकता है, लौट चलूं।तभी उसे कहीं दूर से, एक आवाज आई- हिम्मत मत हारो, बढ़े चलो। तुम्हारी किस्मत का सितारा सात समुद्र पार मिलेगा।शायद सितारा ही बोल रहा था। हड़बड़ा कर उसने आंखें मलीं कि देखूं आवाज किधर से आ रही है? पर आवाज खो गई। सितारा बुझ गया। वह जाग उठा था।


        उसने अपने सपने वाली बात अपने मित्रों को कह सुनाई। एक मित्र बड़ा समझदार था। उसने कहा, "ठीक तो है, किस्मत का सितारा यहां बैठे रहने से नहीं मिलेगा, उसके लिए चलते जाओ, आगे बढ़ते जाओ, सात समुद्र पार जाना पड़े, तो भी जाओ। कहीं तो मिलेगा ही।"

 बात सितारा को लग गई। और वह चल पड़ा।


         चलते-चलते थक कर जब वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगा, तो देखा कि पेड़ का आधा हिस्सा हरा है, आधा सूखा। वह हैरान होकर सोचने लगा- पता नहीं क्या माजरा है?” फिर चलते-चलते एक अजनबी शहर में पहुंचा। वहां ढिंढोरची ढिंढोरा पीट रहा था, “जो कोई राजकुमारी को हंसा देगा, राजा उसे मुंह मांगा इनाम देगा।


        चलते-चलते एक दिन समुद्र के किनारे पहुंच गया। अब समस्या आई कि पार कैसे जाएं? पर अब उसमें हिम्मत आ चुकी थी। उसने निराश होकर सोचना छोड़ दिया था। वह किनारे बैठ कर तरकीब सोचने लगा। तभी उसे एक भारी-भरकम मगरमच्छ दिखाई दिया। जब मगरमच्छ ने पानी से सिर निकाल कर अपना बड़ा-सा मुंह खोला तो वह डर कर पीछे हट गया- हाय राम! यह तो निगल ही जाएगा। पर फिर उसे एकाएक हंसी आ गई। मगरमच्छ ने मुंह दूसरी ओर फेरा कि उसकी बड़ी-सी पीठ दिखाई दे गई। बस उसने आव देखा न ताव, उछल कर पीठ पर सवार हो गया। अब डरने की बारी मगरमच्छ की थी। वह उसे लेकर पानी में सरकने लगा और धीरे-धीरे तैर कर उस पार पहुंचा आया।


          पार उतर कर उसे ख्याल आया- 'इस मगरमच्छ ने मुझे खाया क्यों नहीं? अगर किस्मत का सितारा मिल गया, तो मैं उससे यह बात जरूर पूछूंगा।' और इस बार वह आगे चलने को हुआ तो देखा, सामने पेड़ की टहनी पर वही सितारा चमक रहा था। उसकी आंखें चौंधिया गईं। सितारा ने किस्मत का सितारा पा लिया था। पर अभी उसे अपने प्रश्नों का उत्तर पाना था।


    उसने बैठ कर सोचा- यह सितारा इतनी दूर ही क्यों मिला?

किस्मत का सितारा चमका और उसे जवाब मिला, “इसीलिए कि खूब कड़ी मेहनत और अनुभव से ही वह मिलता है।

और मगरमच्छ ने मुझे अपना भोजन क्यों नहीं बनाया?

 किस्मत का सितारा फिर चमका, “इसलिए कि सच्ची लगन में डूबे हुए व्यक्ति का दुश्मन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

और राजकुमारी हंसती क्यों नहीं?

 सितारा फिर चमका और आवाज आई, “उसे कोई अजूबी चीज दिखाओ।

और वह पेड़...?

 सितारा चमका और हंसी की रोशनी फैल गई, “यह भी कोई पूछने की बात है, खोद कर देख लो।


         वह लौट पड़ा। उसे लगा, वह सितारा भी उसके साथ-साथ चलता आ रहा है। पेड़ और सितारा पीछे छूट गए थे। पर सितारे की रोशनी साथ-साथ चल रही थी। किनारे पर आते ही एक नौका दिखाई दी। मल्लाह ने पुकारा, “चलना है, भाई।

 “हां, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं, चाहो तो बदले में मुझसे कोई काम करा लो।

मल्लाह को बात जंच गई। बोला, “नाव में मेरा बेटा बीमार है। उसकी देखभाल करो, मैं नाव चलाता हूं।


           इस तरह हर जगह अपनी सूझ और मेहनत से काम निकालता वह वापस लौट आया। लौटते समय पहले उस राजमहल में पहुंचा और राजा से बोला, “मैं राजकुमारी से मिलकर उसे हंसाना चाहता हूं, पर आपको उसे मेरे साथ कुछ समय के लिए बाहर जाने की इजाजत देनी होगी।


          राजा सहमत हो गया। उसने दो दूतों को साथ कर राजकुमारी को सितारा के साथ भेज दिया। सितारा के साथ चलती एक रोशनी को देखकर राजकुमारी विस्मित हुई, पर हंसी नहीं। फिर जब वे लोग उस पेड़ के पास पहुंचे तो आधा पेड़ हरा और आधा सूखा देखकर उसे हंसी आ गई। हंसते हुए वह बोली, “तुम तो कोई जादूगर मालूम पड़ते हो, यह क्या चमत्कार है?


         सितारा बोला, “चमत्कार? चमत्कार तो अभी देखना हैऔर उसने पेड़ की जड़ खोदनी शुरू कर दी। पेड़ जिधर से हरा था, उधर से कुछ नहीं मिला। दूसरी तरफ खोदा, तो ढेरों धन मटकों में गड़ा निकल आया। पेड़ का आधा सूखा भाग तुरंत हरा होने लगा। सितारा राजकुमारी की तरफ देखकर मुस्कराया।


         “देखा आपने? जो लोग धन-संपदा को इस तरह गाड़ कर बेकाम कर देते हैं, वे ऐसे ही सूखे-मुरझाए रहते हैं। खुशी और हंसी भी ऐसा ही धन है, इसे भीतर गाड़ कर रखोगी, तो गमगीन ही बनी रहोगी। निकालो... इसे बाहर निकालो और बांट कर चलो। तुम भी इस पेड़ की तरह हरी भरी हो जाओगी।


           राजकुमारी यह चमत्कार देखकर प्रसन्न हो उठी और खिलखिला पड़ी।
    राजदूत चकित रह गए। उन्होंने लौट कर राजा को खबर दी। राजा भी बहुत खुश हुआ। उसने वह सारा धन और अपने पास से भी बहुत-सा धन देकर सितारा के साथ राजकुमारी का विवाह कर दिया।


            सितारा किस्मत का सितारा ही नहीं, किस्मत की राजकुमारी भी साथ लेकर घर लौटा। अब वह धनवान हो गया था, फिर भी निश्चिंत होकर सोता नहीं था। अपने हाथ से अपना काम करता था और दूसरों को भी बताता था कि किस्मत का सितारा बड़ी मेहनत और सूझ-बूझ से मिलता है। मेहनत छोड़ कर भाग्य के भरोसे रह जाऊंगा तो यह फिर हाथ से निकल सकता है।

साभार- पांचजन्य

कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है

       बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई,  इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांजलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सर सैया पर पड़ा हुआ हूँ?''

        यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?''
इस पर पितामह ने कहा, 'हाँ''। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया?

        इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक 101वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरी के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरी के कांटे उसकी पीठ में धंस गये क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।''
तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का 'श्राप' आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा।

        प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।